नगर निकाय चुनाव से पहले टिकट को लेकर बढ़ी हलचल, दावेदारों की दौड़ और सिफारिशों के बीच जनता के सवाल
करतार सिंह की कलम से सच्चाई
जयपुर। नगर निकाय चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों के भीतर टिकटों को लेकर घमासान तेज होता दिखाई दे रहा है। वार्डों में दावेदार सक्रिय हैं, समर्थक अपने-अपने नेताओं के दरवाजे खटखटा रहे हैं और टिकट की दौड़ में शामिल उम्मीदवार लगातार राजनीतिक समीकरण साधने में जुटे हैं। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या टिकट का फैसला जनता की पसंद और वार्ड में उम्मीदवार की पकड़ के आधार पर होगा, या फिर सिफारिश, संपर्क और दूसरे राजनीतिक समीकरण निर्णायक बनेंगे
लोकतंत्र में मतदाता अपने वार्ड का प्रतिनिधि चुनता है। चुनाव से पहले राजनीतिक दल जनता के बीच जाकर विकास, पारदर्शिता और जनसेवा का भरोसा दिलाते हैं। ऐसे में यदि टिकट वितरण में स्थानीय कार्यकर्ताओं और जनता की राय को नजरअंदाज किया जाता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मतदाता के भरोसे की कीमत क्या है?

दावेदारों की लंबी कतार, टिकट पर असली फैसला किसका?
कई वार्डों में एक ही पार्टी से टिकट के कई दावेदार मैदान में हैं। कोई वर्षों से संगठन में काम करने का दावा कर रहा है तो कोई सामाजिक सेवा और जनसंपर्क को अपनी ताकत बता रहा है। कुछ दावेदारों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया, लेकिन टिकट वितरण के समय उनकी मेहनत से ज्यादा राजनीतिक संपर्क को महत्व दिया गया तो कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा होना तय है।
दूसरी तरफ पार्टियों का तर्क रहता है कि जीतने की क्षमता, संगठनात्मक सर्वे, स्थानीय समीकरण और चुनावी रणनीति को देखकर उम्मीदवार का चयन किया जाता है। यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
मतदाता के नाम पर राजनीति, लेकिन टिकट में मतदाता कहां?
चुनाव आते ही जनता से कहा जाता है
आपका वोट लोकतंत्र की ताकत है।” मतदाता भी उम्मीदवारों को उनके काम, व्यवहार और क्षेत्र के विकास के आधार पर चुनने की तैयारी करता है।
लेकिन अगर उम्मीदवार का चयन ही ऐसे बंद कमरों में हो जहां स्थानीय जनता की राय की कोई भूमिका न हो, तो सवाल उठता है—जिस जनता से वोट मांगा जाना है, उसकी पसंद टिकट तय करते समय क्यों नहीं पूछी जाती?
यही सवाल इस बार नगर निकाय चुनाव की राजनीति के केंद्र में दिखाई दे रहा है।
टिकट नहीं मिला तो बगावत का खतरा
टिकट वितरण के बाद राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बगावत की होती है। लंबे समय से तैयारी कर रहे दावेदार टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे उम्मीदवार पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी के वोटों में सेंध लगा सकते हैं।
यानी टिकट का फैसला केवल एक व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने तक सीमित नहीं है। एक गलत फैसला पूरे वार्ड के चुनावी समीकरण को बदल सकता है।
जनता का सवाल—उम्मीदवार काम से तय होगा या पहुंच से?
नगर निकाय चुनाव स्थानीय स्तर का चुनाव है। यहां मतदाता उम्मीदवार को केवल पार्टी के नाम से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत व्यवहार, उपलब्धता और क्षेत्र में किए गए काम से भी आंकता है।
इसलिए जनता के बीच अब एक सीधा सवाल उठ रहा है—
टिकट पाने के लिए सबसे जरूरी क्या है—जनता के बीच पांच साल का काम, संगठन के प्रति निष्ठा और साफ छवि, या फिर राजनीतिक पहुंच?
अगर पार्टियां इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं देतीं तो टिकट वितरण को लेकर उठने वाले सवाल चुनावी मैदान में बड़ा मुद्दा बन सकते हैं।
लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता का
टिकट कोई भी पार्टी दे सकती है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता करता है। इसलिए टिकट वितरण में पारदर्शिता, योग्य उम्मीदवार का चयन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय को महत्व देना राजनीतिक दलों के लिए जरूरी है।
क्योंकि टिकट पर फैसला भले ही पार्टी कार्यालय में हो, लेकिन उम्मीदवार की असली परीक्षा जनता की अदालत में होगी।
नगर निकाय चुनाव में मतदाता इस बार सिर्फ चेहरे नहीं देखेगा—वह यह भी देखेगा कि जिस पार्टी ने लोकतंत्र और जनसेवा की बात की, उसने अपने उम्मीदवार का चयन कितनी पारदर्शिता से किया।
सवाल बड़ा है—क्या टिकट वितरण जनता की पसंद से होगा, या फिर राजनीतिक जोड़-तोड़ का खेल मतदाताओं के भरोसे पर भारी पड़ेगा?
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